जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति ने नेपाल और तिब्बत के आपदा प्रभावित लोगों के प्रति जताई एकजुटता, हिमालय में विकास नीति पर उठाए सवाल
जोशीमठ। जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति ने नेपाल और तिब्बत में प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए उनके साथ एकजुटता जाहिर की है। समिति ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र में लगातार बढ़ रही आपदाओं को केवल प्राकृतिक घटना मानकर अपनी जिम्मेदारी से बचा नहीं जा सकता। इसके लिए सरकारों और नीति-निर्माताओं को विकास परियोजनाओं, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और आपदा जोखिम के बीच संतुलन पर गंभीरता से विचार करना होगा।
समिति ने नेपाल में आपदा के दौरान जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए बचावकर्मियों, स्वयंसेवकों और स्थानीय लोगों के साहस को सलाम किया। समिति ने कहा कि आपदा की इस घड़ी में नेपाल अकेला नहीं है और प्रभावित लोगों के साथ उनकी संवेदनाएं और एकजुटता खड़ी है।
समिति ने तिब्बत के हिमालयी क्षेत्र में आपदाओं का सामना कर रहे लोगों के प्रति भी समर्थन जताया। समिति का कहना है कि पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में आपदा के संकेतों और चेतावनियों को नजरअंदाज करना गंभीर चिंता का विषय है।
समिति ने कहा कि आपदाओं को केवल ‘प्राकृतिक आपदा’ कहकर जिम्मेदारी समाप्त नहीं की जा सकती। हिमालय की भौगोलिक और पर्यावरणीय संवेदनशीलता को देखते हुए विकास परियोजनाओं के प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन और जोखिम का आकलन जरूरी है। जोशीमठ में भू-धंसाव की घटना का हवाला देते हुए समिति ने कहा कि हिमालय के विभिन्न हिस्सों में सामने आ रही घटनाएं एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। केदारनाथ, मंडी, धराली, जोशीमठ सहित हिमालयी क्षेत्र में हुई आपदाएं इस बात की ओर संकेत करती हैं कि पहाड़ी क्षेत्रों में विकास की मौजूदा नीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता है।
समिति ने कहा कि मौसम और जलवायु के बदलते स्वरूप के बीच हिमालयी क्षेत्रों में लगातार निगरानी, वैज्ञानिक अध्ययन और स्थानीय समुदायों के अनुभवों को नीति निर्माण में शामिल करना जरूरी है। विकास परियोजनाओं को मंजूरी देते समय केवल आर्थिक और रणनीतिक जरूरतों को नहीं, बल्कि उनके पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
समिति ने सरकारों के सामने रखीं पांच प्रमुख मांगें
1. हिमालयी राज्यों के बीच क्षेत्रीय सहयोग:
समिति ने आपदाओं के दौरान सीमाओं के पार डेटा साझा करने, आपसी सहयोग और राहत-बचाव के लिए पारदर्शी तंत्र विकसित करने की मांग की है।
2. संवेदनशील क्षेत्रों में ‘नो-गो जोन’:
भूगर्भीय और पर्यावरणीय रूप से अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों तथा नदी घाटियों की पहचान कर वहां पनबिजली और अन्य बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर रोक लगाने की मांग की गई है।
3. पर्यटन और शहरीकरण का नियमन:
समिति ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में पर्यटन, निर्माण और शहरी विकास को पर्यावरणीय एवं जलवायु संबंधी सीमाओं के अनुरूप नियंत्रित किया जाना चाहिए। इसके लिए प्रभावी भू-उपयोग योजनाएं और स्थानीय स्तर पर निर्माण की स्पष्ट सीमाएं तय की जानी चाहिए।
4. समुदाय-केंद्रित राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण:
आपदा प्रभावित लोगों को राहत, मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी देने की मांग की गई है। समिति के अनुसार प्रभावित समुदायों को भूमि, आजीविका और पुनर्निर्माण से जुड़े निर्णयों में अधिकार मिलना चाहिए।
5. विज्ञान और स्थानीय ज्ञान पर आधारित चेतावनी प्रणाली:
समिति ने वास्तविक समय की निगरानी और आधुनिक तकनीकी प्रणालियों के साथ स्थानीय समुदायों के अनुभव, पारंपरिक ज्ञान और पूर्व की आपदाओं से मिली सीख को जोड़कर प्रभावी शुरुआती चेतावनी प्रणाली विकसित करने की मांग की है।
जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति ने कहा कि हिमालय में लगातार सामने आ रही आपदाएं केवल हर घटना के बाद चिंता और संवेदना व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इन घटनाओं के पीछे पैदा हो रहे जोखिमों, विकास गतिविधियों और पर्यावरणीय बदलावों का गंभीर अध्ययन जरूरी है।
समिति ने कहा कि हिमालयी क्षेत्रों के लोगों को अपनी सीमाओं और राज्यों से आगे बढ़कर एकजुट होना होगा और ऐसी विकास नीतियों के खिलाफ आवाज उठानी होगी, जिनका सबसे बड़ा खामियाजा स्थानीय लोगों को भुगतना पड़ता है। समिति ने हिमालय में जलवायु न्याय और सुरक्षित भविष्य के लिए व्यापक जनभागीदारी तथा जवाबदेह विकास नीति की आवश्यकता पर जोर दिया।






