भविष्य के लिए चेतावनी: जोशीमठ के बाद अब हेलंग-कल्पेश्वर की पहाड़ियां भी धंस रहीं

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भविष्य के लिए चेतावनी: जोशीमठ के बाद अब हेलंग-कल्पेश्वर की पहाड़ियां भी धंस रहीं

देहरादून : उत्तराखंड के चमोली जिले में पहले गोपेश्वर और उसके बाद जोशीमठ में भूधंसाव की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। जहां जोशीमठ में वर्तमान में उपचार और पुनर्वास कार्य चल रहा है, वहीं गोपेश्वर में पूर्व में किए गए ट्रीटमेंट के बावजूद कई घरों में आज भी दरारें आने की शिकायतें सामने आ रही हैं। इसी बीच वैज्ञानिकों ने एक और गंभीर खतरे की चेतावनी दी है।

ताजा अध्ययन के अनुसार, जोशीमठ के आसपास स्थित हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्र की पहाड़ियां भी धीरे-धीरे धंस रही हैं, जो भविष्य में बड़े संकट का संकेत है।

 

(वीडियो लिंक: https://youtube.com/shorts/8grkPp1HLmE?si=u6YtgPkNzZbepU_4)

 

राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला के वैज्ञानिकों प्रो. हेलिका दलाल और प्रो. भास्कर कुंडू द्वारा किए गए इस अध्ययन में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत द्वारा उपलब्ध कराए गए जीपीएस टाइम सीरीज डाटा का उपयोग किया गया। यह शोध 22 जुलाई 2026 को प्रतिष्ठित जर्नल फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ताओं ने वर्ष 2017 से 2023 के बीच यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 उपग्रह से प्राप्त 314 रडार इमेज का विश्लेषण किया। इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार (InSAR) तकनीक की मदद से जमीन में मिलीमीटर से लेकर सेंटीमीटर स्तर तक हो रहे बदलावों को मापा गया। इसके साथ ही भूजल, जल भंडारण और लैंड सरफेस डिस्चार्ज मॉडल (LSDM) के आंकड़ों का भी अध्ययन किया गया।

अध्ययन में सामने आया कि हेलंग क्षेत्र में लगभग 40 सेंटीमीटर तक धंसाव दर्ज किया गया, जो अलकनंदा नदी की घाटी की ओर है, जबकि कल्पेश्वर क्षेत्र में करीब 20 सेंटीमीटर तक धंसाव दर्ज हुआ, जो कल्पगंगा घाटी की दिशा में हो रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार नदियों द्वारा ढलानों के निचले हिस्से का लगातार कटाव, भारी वर्षा और पहाड़ों के भीतर जमा हो रहा पानी इस प्रक्रिया को और तेज कर रहा है।

वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि हर भूस्खलन अचानक नहीं होता, बल्कि कई पहाड़ियां वर्षों तक बेहद धीमी गति से धंसती रहती हैं। यही धीरे-धीरे बढ़ता खतरा भविष्य में बड़े हादसों का कारण बन सकता है। यह अध्ययन संकेत देता है कि जोशीमठ जैसी स्थिति अन्य क्षेत्रों में भी बन सकती है, ऐसे में समय रहते ठोस और वैज्ञानिक कदम उठाना बेहद जरूरी है।

 

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