लाटूधाम वाण में नंदा की बड़ी जात और बधाण की लोकजात का अद्भुत देव समागम
धर्म भाई लाटू देवता से मां नंदा का मिलन देख भावुक हुए श्रद्धालु, 12 साल बाद वाण में लौटी रौनक
चमोली। मां नंदा की बड़ी जात और बधाण की लोकजात में शामिल उत्सव डोलियों एवं छंतोलियों के लाटूधाम वाण पहुंचने पर बुधवार को अद्भुत देव समागम देखने को मिला। मां नंदा की उत्सव डोलियों का अपने धर्म भाई लाटू देवता से मिलन हुआ तो यह भावुक दृश्य देख श्रद्धालुओं की आंखें छलछला उठीं। देव डोलियों के वाण पहुंचते ही पूरा गांव मां नंदा के जयकारों से गूंज उठा और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के बीच गांव में करीब 12 वर्षों बाद फिर से रौनक लौटती नजर आई।

बीती 5 सितंबर को नंदा सिद्धपीठ कुरुड़ से रवाना हुई मां नंदा की बड़ी जात में शामिल दशोली और बंड क्षेत्र की उत्सव डोलियां एवं छंतोलियां बुधवार को कनोल गांव में पूजा-अर्चना के बाद कैलास यात्रा के लिए आगे रवाना हुईं। देव डोलियों और छंतोलियों के साथ बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी मां नंदा के जयकारे लगाते हुए वाण पहुंचे।

वहीं, बधाण क्षेत्र की मां नंदा राजराजेश्वरी की उत्सव डोली भी मुंदोली से लोहाजंग होते हुए वाण पहुंची। तीनों देव परंपराओं से जुड़ी डोलियों और छंतोलियों के एक साथ वाण पहुंचने पर यहां भव्य देव समागम हुआ। ग्रामीणों ने पारंपरिक लोकगीतों, जागरों और पुष्पवर्षा के साथ देव डोलियों का स्वागत किया।
लाटू देवता के नेतृत्व में आगे बढ़ेगी कैलास यात्रा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार लाटू देवता को मां नंदा का धर्म भाई और कैलास यात्रा का पथ-प्रदर्शक माना जाता है। वाण से आगे मां नंदा की यात्रा दुर्गम और निर्जन पड़ावों की ओर बढ़ेगी। मान्यता है कि लाटू देवता के नेतृत्व में ही मां नंदा की कैलास यात्रा आगे बढ़ती है।
लाटू देवता मंदिर में मां नंदा की उत्सव डोलियों एवं छंतोलियों के मिलन का दृश्य श्रद्धालुओं के लिए बेहद भावुक रहा। इस दौरान मंदिर परिसर मां नंदा और लाटू देवता के जयकारों से गूंजता रहा।

मां नंदा की बड़ी जात के वाण से अगले पड़ाव के लिए प्रस्थान के अवसर पर जिलाधिकारी गौरव कुमार और एसपी सुरजीत सिंह पंवार ने मां नंदा की डोली की विधिवत पूजा-अर्चना की। उन्होंने मां नंदा का आशीर्वाद लेते हुए जनपदवासियों की सुख-समृद्धि, खुशहाली और शांति की कामना की। साथ ही मां नंदा की बड़ी जात के सकुशल एवं निर्विघ्न संपन्न होने की प्रार्थना की।
पूजा-अर्चना के बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों, जागरों और मां नंदा के जयकारों के बीच डोली को अगले पड़ाव के लिए विदाई दी गई। इस दौरान पूरा वाण क्षेत्र मां नंदा के जयकारों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन से गूंज उठा।
मां नंदा की बड़ी जात में 40 से अधिक छंतोलियों, सैकड़ों देव निशानों और बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की सहभागिता है। वाण से प्रस्थान के दौरान जागरों और मांगल गीतों के बीच मां नंदा की डोली आगे बढ़ी। डोली के साथ चल रहे श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और श्रद्धा का भाव देखने को मिला।
ग्रामीणों ने अपनी पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक संस्कृति के अनुरूप मां नंदा की डोली को भावभीनी विदाई दी। इसके साथ ही बड़ी जात अपनी आगे की दुर्गम यात्रा के लिए रवाना हो गई।
इससे पहले मुंदोली में मां नंदा राजराजेश्वरी की उत्सव डोली को भावपूर्ण विदाई दी गई। मां नंदा ने अपने भाई बाला द्यौसिंह देवता के जन्मस्थान मुंदोली से विदाई ली तो माहौल भावुक हो गया। श्रद्धालुओं ने मां नंदा से क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की मनौती मांगी।
लोक मान्यता के अनुसार, दुर्गम कैलास यात्रा में मार्गदर्शन और अगवानी के लिए द्यौसिंह देवता से भी साथ चलने का आग्रह किया जाता है। लोक परंपरा में द्यौसिंह और लाटू देवता की मौजूदगी के बिना कैलास मार्ग की कठिन यात्रा को सुगम नहीं माना जाता।
भाई-बहन के पवित्र रिश्ते, लोक संस्कृति और अटूट आस्था से जुड़ी मां नंदा की यह यात्रा अब दुर्गम और निर्जन पड़ावों की ओर बढ़ रही है। वाण में हुए इस देव समागम ने एक बार फिर उत्तराखंड की समृद्ध लोक परंपराओं और धार्मिक आस्था की अनूठी झलक प्रस्तुत की।







