राष्ट्रीय नाट्य समारोह में ‘जीतू बगड़वाल’ की गूंज — देशभक्ति और उत्तराखंड की लोकसंस्कृति ने जीता दर्शकों का दिल
नई दिल्ली स्थित संगीत नाटक अकादमी द्वारा “वंदे मातरम्” राष्ट्रगीत के 150 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में देशव्यापी भव्य नाट्य समारोह का आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक अवसर पर 15 जुलाई 2026 (कालिदास जयंती) के दिन पूरे देश में एक साथ 150 नाट्य प्रस्तुतियाँ मंचित की गईं। 39 भारतीय भाषाओं में आयोजित इस विशाल सांस्कृतिक अभियान में 150 से अधिक नाट्य संस्थाओं के 4,000 से अधिक कलाकारों ने भाग लिया, जिसे देशभर में 20 लाख से अधिक दर्शकों ने देखा।

उत्तराखंड में इस आयोजन का सफल मंचन उत्तरकाशी और पिथौरागढ़ में हुआ, जहां प्रसिद्ध लोकगाथा पर आधारित नाटक “जीतू बगड़वाल” ने विशेष आकर्षण का केंद्र बनकर दर्शकों को भावविभोर कर दिया। कार्यक्रम की समन्वयक पद्मश्री बसंती बिष्ट ने आयोजन की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए संगीत नाटक अकादमी, स्थानीय प्रशासन और जनता का आभार जताया। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन हमारी समृद्ध लोकसंस्कृति को राष्ट्रीय मंच प्रदान करते हैं।

‘जीतू बगड़वाल’ नाटक केवल एक लोककथा नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति समर्पण, लोक परंपराओं की रक्षा और क्षेत्रीय अस्मिता के संरक्षण की प्रेरणादायक गाथा है। नाटक में जीतू के साहस, त्याग और कर्तव्यनिष्ठा को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया, जिसने दर्शकों में राष्ट्रप्रेम, वीरता और बलिदान की भावना को और मजबूत किया। यह प्रस्तुति खासतौर पर युवा पीढ़ी को अपनी संस्कृति और विरासत से जुड़ने के लिए प्रेरित करती नजर आई।

इस नाट्य प्रस्तुति में अंकिता, रानी, काजल, आईशी, सिमरन, अमित, अनिल, आलोक, जयप्रकाश राणा, गंगा डोगरा, अजय नौटियाल, डॉ. अजीत पंवार, संजय पंवार, गोविंद बिष्ट, विपिन नेगी, राजेश जोशी, हरदेव पंवार, जयप्रकाश नौटियाल, धनपाल, उत्तम रावत, आलोक रावत, रोशन और जाह्नवी सहित अनेक कलाकारों ने अपने जीवंत और प्रभावशाली अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।
नाटक की सबसे खास बात इसकी सशक्त मंच सज्जा, प्रभावी प्रकाश व्यवस्था और उत्तराखंड की पारंपरिक वेशभूषा रही, जिसने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया। लोकधुनों पर आधारित संगीत और गीतों ने प्रस्तुति में भावनात्मक गहराई जोड़ी, जिससे दर्शक शुरुआत से अंत तक नाटक से जुड़े रहे।
और ‘जीतू बगड़वाल’ की यह प्रस्तुति न केवल सफल रही, बल्कि दर्शकों के मन में अपनी अमिट छाप छोड़ने में भी कामयाब रही। यह नाटक देशभक्ति और लोकसंस्कृति के संगम का एक बेहतरीन उदाहरण बनकर उभरा।



